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01 मई, 2012

"सेक्शुएलिटी से हमेशा पुरुषों को ही क्यों परेशानी होती है?" : अनुराग कश्यप




(अनुराग कश्यप से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत पर आधारित यह लेख 'तहलका' के सिनेमा विशेषांक (15 मई, 2012) में छपा है। अनुराग जिस ईमानदारी से अपने जीवन और काम के बारे में बात करते हैं, वह 'सही' और 'अच्छा' होने के इस समय में बहुत दुर्लभ है। उनका शुक्रिया कि वे उम्मीद जगाते हैं और बेशर्म अँधेरे में टॉर्च लेकर खड़े रहते हैं।) 




‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’
के समय सब बोल रहे थे कि क्यों बना रहे हो? मत बनाओ। मुझे जितने ज्यादा लोग बनाने से मना करते हैं मुझे उतना ही लगता है कि मुझे यह फिल्म जरूर बनानी चाहिए।

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18 दिसंबर, 2010

सत्तर मिनट का धुनी: शिमित अमीन


शिमित अमीन लॉस एंजिल्स में रहते थे. वहीं से ‘भूत’ की एडिटिंग करते हुए रामगोपाल वर्मा ने उन्हें ‘अब तक छप्पन’ का निर्देशक बनने को कहा. अपने निर्देशक बनने को शिमित महज एक संयोग मानते हैं, लेकिन यदि ऐसा है तो यह दशक के सबसे खूबसूरत संयोगों में से एक है.
’अब तक छप्पन’ पुलिसवालों की ‘सत्या’ ही है, जो आपको चौंकाती है लेकिन उसके लिए उसे लंबे एक्शन दृश्यों की जरूरत नहीं है. उसके किरदार आम हैं, उनकी मजबूरियां, इच्छाएं और बातें भी आम.

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रब के रूठने से बेपरवाह : इम्तियाज अली



अनुराग की फिल्मों में जितना तनाव है, इम्तियाज की फिल्मों में उतना ही उल्लास है. उनके नायक अमीर हैं, अक्सर उद्योगपति (बशर्तें आप ‘लव आजकल’ के पुराने सैफ को छोड़ दें) और उनकी नायिकाएं परियों जैसी हैं, खुशी के रंग के कपड़े पहनकर चहकती और लगातार बोलती हुईं. उनके किरदार हाजिरजवाब हैं, उनकी मुश्किलें बस प्यार की ही हैं और उनकी फिल्मों में कुछ पंजाबी किस्म के गाने और एक खूब हिट होने वाला उदास गाना(‘एक पेड़ हमने प्यार का’, ‘आओगे जब तुम साजना’ या ‘ये दूरियां’) जरूर होता है. अब आप कह सकते हैं कि फिर उनके नायक राज मल्होत्रा से, उनकी नायिकाएं अंजलि से और उनकी फिल्में ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ से कैसे अलग हैं और वे क्या नया रच रहे हैं?

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खोसला, लकी और धोखा: दिबाकर बनर्जी


दिबाकर को इतनी आसानी से नहीं समझा जा सकता. बड़ी वजह यह है कि आप उनकी फिल्मों को बाकी निर्देशकों की तरह खास जॉनर या खांचों में नहीं बांट सकते. वे एक फिल्म बनाते हैं और उसे चाहने वाले दर्शकों का एक बड़ा वर्ग और फिर उसे भूलकर बिल्कुल अलग किस्म की दूसरी फिल्म बनाते हैं, जिससे दूसरा वर्ग जुड़ता है और दिबाकर अगली बार उसके भी वफादार नहीं रहते.

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जग जा री गुड़िया... : विशाल भारद्वाज


विशाल भारद्वाज के भीतर दो तरह के विशाल भारद्वाज हैं. कमीने के गुड्डू और चार्ली की तरह, लेकिन दोनों हकलाते या तुतलाते नहीं हैं. एक के पास अपार दुख, विश्वासघात और क्रोध की कहानियां हैं और दूसरे के पास बच्चों की कहानियां.

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15 दिसंबर, 2010

जहां ज़िंदगी प्रेमगीत नहीं रह पाती: अनुराग कश्यप

सिनेमा को मनोरंजन ही करना चाहिए या कुछ सार्थक कहने की कोशिश भी करनी चाहिए, इस पर लम्बी बहसें होती रही हैं लेकिन बहसों में पड़े बिना अस्सी और नब्बे के दशक के सतही दौर से हिन्दी सिनेमा को उबारने के लिए पिछले कुछ सालों में कई हाथ खामोशी से उठते गए हैं. किसी क्रांति के दावे किए बिना उन्होंने वह बनाया है, जिसे बनाने के लिए वे नागपुर, जमशेदपुर या बनारस की अपनी बेचैन रातें छोड़कर मुंबई आए थे. उसका हिस्सा पटकथा लेखक भी हैं, सिनेमेटोग्राफर, एडिटर और गीतकार, संगीतकार भी. उन सब के हिस्सों को पर्याप्त सम्मान देते हुए हम इस श्रंखला में उन निर्देशकों की बात कर रहे हैं जिन्होंने बिना नारे लगाए परंपरा बदली है. जिन्होंने हिन्दी फिल्मों की एक नई धारा विकसित की है जो मनोरंजन करने के लिए अपनी गहराई नहीं छोड़ती. सबसे पहले अनुराग...

कमाल अचानक नहीं होता, लेकिन लगता अचानक ही है. वह पहाड़गंज के एक बेंच जैसे बिस्तर पर होता है जहां चंदा देव को बताती है कि कैसे उसके प्रेमी ने उसका एमएमएस बनाया था, जो देश भर के लोगों ने डाउनलोड करके देखा. उन देखने वालों में उसके पिता भी थे जिन्होंने आत्महत्या कर ली, यह कहने की बजाय कि कोई बात नहीं बेटा, जो हो गया सो हो गया, अब सब भूल जाओ.

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