03 मार्च, 2011

एक जिद्दी लड़का, जिसे वे तोड़ नहीं पाए

यह लेख तहलका के 15 मार्च, 2011 के अंक में छपा है। पहली फ़ोटो में अनुराग की बायीं तरफ़ खड़े जिन सज्जन का चेहरा और सिर लाल गमछे ने ढक रखा है, वे प्रतिभाशाली राजीव रवि हैं, जिनकी सिनेमेटोग्राफी आप देव डी और गुलाल में भी देख चुके हैं।



आप पिछले कुछ सालों की हिन्दी फिल्में देखते होंगे और ज़्यादा आशावादी नहीं होंगे तो यह उम्मीद नहीं करेंगे कि कोई फिल्म की शूटिंग करने मुम्बई-दिल्ली या किसी महानगर से बाहर जाएगा। बाहर जाएगा तो समन्दर लाँघकर विदेश चला जाएगा। फिल्मों की कहानियां इन शहरों के ही थोड़े गरीब हिस्सों तक पहुंच जाएँ तो भी हम अहसानमन्द होंगे। ऐसे माहौल में हम बनारस पहुँचते हैं, जहाँ अनुराग कश्यप अपनी अगली फिल्म की शूटिंग कर रहे हैं।

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28 फ़रवरी, 2011

4 महीने, तीन हफ़्ते और दो दिन



4 months, 3 weeks and 2 days (Romanian)
निर्देशक- Cristian Mungiu
http://www.imdb.com/title/tt1032846/

यह रोमानिया की फ़िल्म है- एक हॉस्टल में रहने वाली दो लड़कियों के बारे में, फिर उनसे होते हुए एक आदमी के बारे में, जो अपने पेशे जितना ही कठोर हो गया है, फिर लौटकर उन लड़कियों की विवशता के बारे में, एक लड़की के प्रेमी के बारे में जिसकी कोई गलती नहीं है लेकिन ऐसा लगने लगता है, गलती उसके माता-पिता की है, जो हम सबकी दुनिया में भी हैं।
लेकिन आप धीरज रख सकते हों, तभी यह फिल्म देखें। यह उन फिल्मों में से है जो असल में वास्तविक होती हैं। जो नाटकीयता या गति के लिए अपने सफ़र के किसी भी हिस्से को नहीं काटना चाहतीं। उनका सारा दुख ज़िन्दगी जैसी धीमी गति से ही उतना गहरा हो पाता है।



24 फ़रवरी, 2011

Patiala House: जाने ये कैसे लोग हैं!


चूंकि अक्षय कुमार की पिछली कुछ फिल्में देखने के बाद आप पहले से ही जानते होंगे कि पटियाला हाऊस एक खराब फिल्म है, इसलिए मैं चाहकर भी इसे रहस्य खोलने की तरह आपको नहीं बता सकता। मैं आपसे बस यह सवाल पूछ सकता हूं कि निखिल आडवाणी के गुरू करण जौहर दुनिया को कम जानते हैं या निखिल आडवाणी?

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01 जनवरी, 2011

पिछले दशक के मेरे पसंदीदा 20 फ़िल्मी गाने यानी एक और Top 20 list

लिस्ट बनाने का रिवाज़ है इसलिए मेरा भी मन किया कि एक बनाऊँ। ये 2001-2010 के बीच आई हिन्दी फ़िल्मों के मेरे पसंदीदा गाने हैं। पसंद के सब गाने यहाँ नहीं हैं लेकिन इन्हें आप प्रतिनिधि तो समझ ही सकते हैं। इनमें से ज़्यादातर फ़िल्मों के एक से अधिक गाने मुझे बहुत पसंद हैं इसलिए एक गाने को उस पूरी एलबम का प्रतिनिधि भी माना जा सकता है। जैसे 'ओमकारा' का 'बीड़ी जलई ले' या 'रंग दे बसंती' का 'खलबली' भी इस सूची में होने के हक़दार थे लेकिन '20 गाने' लिखना अच्छा लगता है इसलिए उन्होंने अपने भाइयों को अपना संदेश देकर भेजा है।

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18 दिसंबर, 2010

सत्तर मिनट का धुनी: शिमित अमीन


शिमित अमीन लॉस एंजिल्स में रहते थे. वहीं से भूत की एडिटिंग करते हुए रामगोपाल वर्मा ने उन्हें अब तक छप्पन का निर्देशक बनने को कहा. अपने निर्देशक बनने को शिमित महज एक संयोग मानते हैं, लेकिन यदि ऐसा है तो यह दशक के सबसे खूबसूरत संयोगों में से एक है.
अब तक छप्पन पुलिसवालों की सत्या ही है, जो आपको चौंकाती है लेकिन उसके लिए उसे लंबे एक्शन दृश्यों की जरूरत नहीं है. उसके किरदार आम हैं, उनकी मजबूरियां, इच्छाएं और बातें भी आम.

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रब के रूठने से बेपरवाह : इम्तियाज अली



अनुराग की फिल्मों में जितना तनाव है, इम्तियाज की फिल्मों में उतना ही उल्लास है. उनके नायक अमीर हैं, अक्सर उद्योगपति (बशर्तें आप लव आजकल के पुराने सैफ को छोड़ दें) और उनकी नायिकाएं परियों जैसी हैं, खुशी के रंग के कपड़े पहनकर चहकती और लगातार बोलती हुईं. उनके किरदार हाजिरजवाब हैं, उनकी मुश्किलें बस प्यार की ही हैं और उनकी फिल्मों में कुछ पंजाबी किस्म के गाने और एक खूब हिट होने वाला उदास गाना(एक पेड़ हमने प्यार का, आओगे जब तुम साजना या ये दूरियां) जरूर होता है. अब आप कह सकते हैं कि फिर उनके नायक राज मल्होत्रा से, उनकी नायिकाएं अंजलि से और उनकी फिल्में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे से कैसे अलग हैं और वे क्या नया रच रहे हैं?

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खोसला, लकी और धोखा: दिबाकर बनर्जी


दिबाकर को इतनी आसानी से नहीं समझा जा सकता. बड़ी वजह यह है कि आप उनकी फिल्मों को बाकी निर्देशकों की तरह खास जॉनर या खांचों में नहीं बांट सकते. वे एक फिल्म बनाते हैं और उसे चाहने वाले दर्शकों का एक बड़ा वर्ग और फिर उसे भूलकर बिल्कुल अलग किस्म की दूसरी फिल्म बनाते हैं, जिससे दूसरा वर्ग जुड़ता है और दिबाकर अगली बार उसके भी वफादार नहीं रहते.

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जग जा री गुड़िया... : विशाल भारद्वाज


विशाल भारद्वाज के भीतर दो तरह के विशाल भारद्वाज हैं. कमीने के गुड्डू और चार्ली की तरह, लेकिन दोनों हकलाते या तुतलाते नहीं हैं. एक के पास अपार दुख, विश्वासघात और क्रोध की कहानियां हैं और दूसरे के पास बच्चों की कहानियां.

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15 दिसंबर, 2010

जहां ज़िंदगी प्रेमगीत नहीं रह पाती: अनुराग कश्यप

सिनेमा को मनोरंजन ही करना चाहिए या कुछ सार्थक कहने की कोशिश भी करनी चाहिए, इस पर लम्बी बहसें होती रही हैं लेकिन बहसों में पड़े बिना अस्सी और नब्बे के दशक के सतही दौर से हिन्दी सिनेमा को उबारने के लिए पिछले कुछ सालों में कई हाथ खामोशी से उठते गए हैं. किसी क्रांति के दावे किए बिना उन्होंने वह बनाया है, जिसे बनाने के लिए वे नागपुर, जमशेदपुर या बनारस की अपनी बेचैन रातें छोड़कर मुंबई आए थे. उसका हिस्सा पटकथा लेखक भी हैं, सिनेमेटोग्राफर, एडिटर और गीतकार, संगीतकार भी. उन सब के हिस्सों को पर्याप्त सम्मान देते हुए हम इस श्रंखला में उन निर्देशकों की बात कर रहे हैं जिन्होंने बिना नारे लगाए परंपरा बदली है. जिन्होंने हिन्दी फिल्मों की एक नई धारा विकसित की है जो मनोरंजन करने के लिए अपनी गहराई नहीं छोड़ती. सबसे पहले अनुराग...

कमाल अचानक नहीं होता, लेकिन लगता अचानक ही है. वह पहाड़गंज के एक बेंच जैसे बिस्तर पर होता है जहां चंदा देव को बताती है कि कैसे उसके प्रेमी ने उसका एमएमएस बनाया था, जो देश भर के लोगों ने डाउनलोड करके देखा. उन देखने वालों में उसके पिता भी थे जिन्होंने आत्महत्या कर ली, यह कहने की बजाय कि कोई बात नहीं बेटा, जो हो गया सो हो गया, अब सब भूल जाओ.

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01 दिसंबर, 2010

ब्रेक के बाद वापस मत आइए


रेणुका कुंजरू और दानिश असलम को गलतफहमी थी कि इम्तियाज अली जैसी फिल्में लिखकर हिट हो जाना दुनिया का सबसे आसान काम है और नकल से चिढ़ने वाले लोगों के लिए खुशखबरी है कि वे बुरी तरह असफल हुए हैं. यह फिल्म बॉलीवुड या किसी भी बाजार की इस भेड़चाल की भी पोल खोलती है, जो एक प्रोडक्ट ज्यादा बिक जाने पर बिना सोचे समझे रंग बदलकर उसकी नकल निकालने के आइडिया से आगे सोच ही नहीं सकती. फिल्म की आत्मा शायद कहीं तेल लेने चली गई है क्योंकि पूरी फिल्म में हम पर डायलॉग्स की लगातार बमबारी होती है लेकिन न हंसना आता है, न रोना. दीपिका बार-बार गुस्से में पैर पटकती हुई इतनी ओवरएक्टिंग करती हैं कि ‘लव आजकल’ की उनकी बिलकुल इसी किरदार की अच्छी छवि को भूल जाने का मन करता है.

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